Tuesday, September 04, 2007

वो...


Sometimes it happens that you dont understand the value of any one's existance untill that person is with you. Once you are away you realise the importance.... Life goes on... but somewhere in the depth of your heart you feel that person is near you and you yearn for that company....


But by that time that becomes a memory and just a feeling which you can feel but cant touch..........and WO..... becomes a mirage............



वीरान सी गलियों में
बदहवास सा दौरता मैं
किसी परछाई को .....
पकड़ने कि नाकाम सी
कोशिश करता …
हर मोड़ पर  मुड़ता और
ढूंढता उन कदमो के निशा


जो शायद तेज़ हवा
के साथ ना जाने
कब के मिट गए थे .....


आसमान के तारों मे
ढूंढता  उस चहरे को
और हथेली कि लकीरों मे
उसे जकरने कि
कोशिश करता मैं
महसूस करता उसे
बारिश की हर बूंदों मे
ओस की हर मोती मे
चमकता सा दिखता वो .....


सूरज कि हर किरण मे
देखता उसको  मैं
शाम के दुन्धल्के में
पहचानने कि कोशिश
करता मैं........


वो चेहरा जो पहले आम
सा लगता था
आज क्यो बार बार
मेरी आखों के सामने
घूमता रहता है…


वो चेहरा जो कभी
भी अज़ीज़ नही था मुझे
आज क्यो मुझे मेरी
जिन्दगी सा लगता है…




No comments: