Wednesday, January 03, 2007

WAJAH……….

वजह 

म मुक्कमल जहाँ ढूंढते हैं 
अपनी जमीन अपना आसमा ढूंढते हैं 
आसमान के सितारों में अपने निशाँ  ढूंढते हैं 
जो राहें खो गयी है कहीं 
हथेली की लकीरों में उनका पता  ढूंढते हैं 

बहुत उलझी है राहें ज़िंदगी की मेरी 
पहेली के किताबों में जवाब ढूंढते हैं 
हज़ार राहों में कुछ इस तरह मुड़े हैं 
हर राह से अपने घर का पता पूछते हैं 

निभाए हर रिश्ते हर वाडे सबसे 
फिर भी अपनों के रूठने की वजह ढूंढते हैं 
दर्द के आंसू को खुशी की बता के 
क्यों हर बार हसने की वजह ढूंढते हैं 

देख लिए हज़ारों रंग इस ज़माने के 
फिर भी जाने कौन स खला ढूंढते है 
खोये हैं कुछ इस तरह अपने ही मकान  में हम 
की हर बात में जीने की वजह ढूंढते है