
वो लड़का
हमेशा की तरह
मेरी आँखें
आज फिर ढूंढ रही थी
उस छोटे से
काले, घुंघराले बालों वाले
दुबले लड़के को
उस दूकान पे।
पता नहीं क्यों
शून्य सी उसकी आँखें
मेरे दिल में
नश्तर की तरह
हर बार चुभ जाती हैं
और मेरा मन
सिहर जाता है
उसके चेहरे का
वो खालीपन
और उसके माथे के
वो बल देख कर
और मैं खोजने लगती हूँ
अनगिनत मतलब
उसकी घूरती हुयी आँखों का..
मन काँप उठता है
उसके दो नाज़ुक कन्धों पे
पुरे घर का भार देख कर
उसके मासूम से चेहरे पर
बुजुर्गो सी सिकन देख कर
हर आने जाने वाले
बच्चों को
कौतुक हो देखती
उसकी आँखें ,
जिसमे तैर जाता है
दुःख, उनके जैसा
नहीं हो पाने का.....
झकजोर देता है
मेरे अंतरमन को....
अब शायद मैंने समझा
पेट की आग शायद
ऐसी ही होती है..
जो जला देती है
हर ख्वाब आँखों से
जो छीन लेती है
हर एक खिलौना
एक बचपन से....
शायद मैं हर बार
उस दुकान पे
वही बचपन
उसकी आँखों में
खोजने जाती हूँ
और बार बार नाकाम
हो जाती हूँ.....
1 comment:
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